Wheat- HD 3386
ICAR-IARI की एक नई ब्रेड गेहूं की किस्म, HD 3386, उत्तर-पश्चिम भारत में समय पर बोई जाने वाली सिंचाई वाली जगहों के लिए तैयार की गई है। इसमें ज़ंग से लड़ने की मज़बूत क्षमता और ज़्यादा पैदावार की क्षमता है - यह पुरानी किस्म HD-2967 का एक प्रैक्टिकल रिप्लेसमेंट है।
सरकार द्वारा स्वीकृत किस्म
उत्तर भारत में समय पर बुवाई और सिंचाई वाली जगहों के लिए ICAR की बताई गई गेहूं की किस्म।
उत्तर भारतीय मिट्टी के प्रकारों के लिए उपयुक्त
पंजाब, हरियाणा, पश्चिमी UP, राजस्थान और आस-पास के इलाकों में अच्छा परफॉर्म करता है।
रोग सहनशीलता
खेत में गेहूं की मुख्य रस्ट बीमारियों के प्रति अच्छी सहनशीलता दिखाता है।
उच्च उपज क्षमता
खेती के बताए गए तरीकों से ज़्यादा और स्थिर पैदावार मिलती है।
उत्कृष्ट अनाज गुणवत्ता
अच्छी पिसाई और चपाती बनाने की क्वालिटी के साथ मोटे अनाज पैदा करता है।
किसान विश्वसनीय और प्रमाणित
लगातार परफॉर्मेंस और भरोसेमंद रिटर्न के लिए किसान इसे पसंद करते हैं।
HD 3386 को क्यों चुनें?
ज़्यादा पैदावार, कोई दिक्कत नहीं - समय पर बोई गई सिंचाई वाली जगहों पर अच्छी पैदावार देता है।
बिल्ट-इन रस्ट रेज़िस्टेंस - पीले और भूरे रस्ट से मज़बूत सुरक्षा, कम रिस्क, कम स्प्रे कॉस्ट।
मॉडर्न HD-2967 अपग्रेड - बेहतर स्टेबिलिटी, हेल्दी फसल, और ज़्यादा भरोसेमंद रिटर्न।

बुआई का समय (Sowing Time)
HD 3386 गेहूं की बुआई समय पर सिंचित परिस्थितियों में 10 नवम्बर से 30 नवम्बर के बीच करना सबसे उपयुक्त माना जाता है।

कुल अवधि
(Crop Duration)
यह किस्म सामान्यतः लगभग 140–145 दिनों में पककर तैयार हो जाती है।

उपज क्षमता (Yield Potential)
HD 3386 की संभावित उपज लगभग 25 क्विंटल प्रति एकड़ (60–63 क्विंटल प्रति हेक्टेयर) तक प्राप्त हो सकती है।

दाना गुणवत्ता (Grain Quality)
इस किस्म के दाने अच्छी गुणवत्ता वाले, चपाती बनाने के लिए उपयुक्त और पोषक तत्वों (आयरन व जिंक) से समृद्ध होते हैं।

रोग प्रतिरोध (Disease Resistance)
HD 3386 में पीली रतुआ (Yellow Rust) और पत्ती रतुआ (Leaf Rust) के प्रति अच्छा प्रतिरोध पाया जाता है।

उपयुक्त क्षेत्र (Suitable Regions)
यह किस्म उत्तर-पश्चिमी मैदानी क्षेत्र जैसे पंजाब, हरियाणा, दिल्ली, पश्चिमी उत्तर प्रदेश और राजस्थान में सिंचित परिस्थितियों के लिए उपयुक्त है।

प्रबंधन सुझाव (Management Tips)
अच्छी उपज के लिए समय पर बुआई, संतुलित उर्वरक प्रबंधन और प्रमुख अवस्थाओं पर 3–4 सिंचाई करना लाभदायक रहता है।
