Pusa Basmati 1121 (PB 1121)
बासमती की एक बेमिसाल किस्म, जो अपने दानों की असाधारण लंबाई, पकने पर दानों के बेहतरीन फैलाव, मनमोहक खुशबू और बाज़ार में अपनी भारी मांग के लिए जानी जाती है।
सरकार द्वारा अनुमोदित किस्म
ICAR द्वारा विकसित बासमती की यह किस्म सिंचित उत्तरी भारतीय परिस्थितियों के लिए उपयुक्त है।
उत्तर भारतीय मिट्टी के प्रकारों के लिए उपयुक्त
पंजाब, हरियाणा, पश्चिमी उत्तर प्रदेश, उत्तराखंड और जम्मू क्षेत्रों के लिए अच्छी तरह से अनुकूलित।
रोग सहनशीलता
अनुशंसित क्षेत्रीय पद्धतियों के तहत, प्रमुख रोगों के प्रति मध्यम रूप से सहनशील।
उच्च उपज क्षमता
उचित फसल प्रबंधन के तहत स्थिर प्रदर्शन के साथ प्रतिस्पर्धी उपज प्रदान करता है।
उत्कृष्ट दाने की गुणवत्ता
बेहद लंबे और पतले दाने, जिनमें असाधारण लंबाई और बासमती की तेज़ खुशबू होती है।
किसान विश्वसनीय और प्रमाणित
विश्व स्तर पर पसंदीदा बासमती किस्म, जो अपनी बेहतरीन निर्यात गुणवत्ता और उच्च बाज़ार मूल्य के लिए जानी जाती है।
PB 1121 को क्यों चुनें ?
दुनिया के सबसे लंबे पकने वाले बासमती दानों में से एक।
बिरयानी और प्रीमियम व्यंजनों के प्रति उपभोक्ताओं की उच्च प्राथमिकता
निर्यात और घरेलू प्रीमियम बाज़ारों में ज़बरदस्त मांग

बुआई का समय (Sowing Time)
PB-1121 की नर्सरी बुआई मई के अंतिम सप्ताह से जून के पहले पखवाड़े तक तथा रोपाई जून के अंत से जुलाई के पहले सप्ताह तक उपयुक्त रहती है।

कुल अवधि
(Crop Duration)
यह किस्म सामान्यतः लगभग 140–145 दिनों में पककर तैयार हो जाती है।

उपज क्षमता (Yield Potential)
PB-1121 की औसत उपज लगभग 18–20 क्विंटल प्रति एकड़ (45–50 क्विंटल प्रति हेक्टेयर) तक प्राप्त हो सकती है।

दाना गुणवत्ता (Grain Quality)
इस किस्म के दाने अतिरिक्त लंबे, पतले, अत्यधिक सुगंधित और पकने पर बहुत अधिक लंबाई बढ़ोतरी (kernel elongation) वाले होते हैं।

रोग प्रतिरोध (Disease Resistance)
PB-1121 में बैक्टीरियल लीफ ब्लाइट (BLB) के प्रति मध्यम सहनशीलता होती है, जबकि ब्लास्ट के प्रति संवेदनशील हो सकती है।

उपयुक्त क्षेत्र (Suitable Regions)
यह किस्म उत्तर भारत के बासमती क्षेत्र जैसे पंजाब, हरियाणा, पश्चिमी उत्तर प्रदेश, उत्तराखंड और जम्मू क्षेत्र के लिए उपयुक्त है।

प्रबंधन सुझाव (Management Tips)
बेहतर गुणवत्ता और निर्यात योग्य उत्पादन के लिए समय पर रोपाई, संतुलित उर्वरक प्रबंधन और नियंत्रित सिंचाई (विशेषकर फूल व दाना बनने के समय) आवश्यक है।
