Pusa Basmati PB-1885
पूसा बासमती 1885 (PB-1885)- मीडियम ड्यूरेशन, ज़्यादा पैदावार वाली बासमती, जिसमें बहुत लंबे दाने, बेहतरीन कुकिंग क्वालिटी और ब्लास्ट और बैक्टीरियल ब्लाइट के लिए इनबिल्ट रेजिस्टेंस है। प्रीमियम मार्केट के लिए आइडियल।
सरकार द्वारा अनुमोदित किस्म
ICAR द्वारा विकसित बासमती की यह किस्म उत्तरी भारत की सिंचित परिस्थितियों के लिए उपयुक्त है।
उत्तर भारतीय मिट्टी के प्रकारों के लिए उपयुक्त
पंजाब, हरियाणा, पश्चिमी उत्तर प्रदेश, उत्तराखंड और जम्मू क्षेत्रों के लिए अच्छी तरह से अनुकूलित।
रोग सहनशीलता
खेत की परिस्थितियों में यह ब्लास्ट और बैक्टीरियल लीफ ब्लाइट के प्रति बेहतर सहनशीलता दर्शाता है।
उच्च उपज क्षमता
पारंपरिक बासमती किस्मों की तुलना में बेहतर पैदावार की क्षमता प्रदान करता है।
उत्कृष्ट दाने की गुणवत्ता
बेहद लंबे, पतले दाने, जिनमें बेहतरीन फैलाव और बासमती की तेज़ खुशबू होती है।
किसान विश्वसनीय और प्रमाणित
बेहतर उपज और प्रीमियम अनाज की गुणवत्ता के लिए इसे तेज़ी से अपनाया गया।
PB 1885 को क्यों चुनें ?
एक्सपोर्ट-ग्रेड अनाज की लंबाई + खुशबू - प्रीमियम मार्केट वैल्यू।
पहले से मौजूद बीमारी से लड़ने की क्षमता - फसल का कम नुकसान और केमिकल का खर्च कम होना।
PB-1121 जैसी खाने/पकाने की क्वालिटी और बेहतर रेज़िलिएंस।

बुआई का समय (Sowing Time)
PB-1885 की नर्सरी बुआई मई के अंतिम सप्ताह से जून के पहले पखवाड़े तक तथा रोपाई जून के अंत से जुलाई के पहले सप्ताह तक उपयुक्त रहती है।

कुल अवधि
(Crop Duration)
यह किस्म सामान्यतः लगभग 135–140 दिनों में पककर तैयार हो जाती है।

उपज क्षमता (Yield Potential)
PB-1885 की औसत उपज लगभग 20–22 क्विंटल प्रति एकड़ (50–55 क्विंटल प्रति हेक्टेयर) तक प्राप्त हो सकती है।

दाना गुणवत्ता (Grain Quality)
इस किस्म के दाने अतिरिक्त लंबे, पतले, कम चॉकनेस वाले, उत्कृष्ट खुशबू और पकने पर उच्च लंबाई बढ़ोतरी वाले होते हैं।

रोग प्रतिरोध (Disease Resistance)
PB-1885 में ब्लास्ट और बैक्टीरियल लीफ ब्लाइट (BLB) के प्रति अच्छा प्रतिरोध पाया जाता है।

उपयुक्त क्षेत्र (Suitable Regions)
यह किस्म उत्तर भारत के बासमती उगाने वाले क्षेत्र जैसे पंजाब, हरियाणा, पश्चिमी उत्तर प्रदेश, उत्तराखंड और जम्मू क्षेत्र के लिए उपयुक्त है।

प्रबंधन सुझाव (Management Tips)
अच्छी उपज और गुणवत्ता के लिए समय पर रोपाई, संतुलित उर्वरक प्रबंधन और नियंत्रित सिंचाई (खासकर दाने भरने के समय) अपनाना आवश्यक है।
